बौद्धिक संपदा के लिए छात्रों में जागरुकता उत्पन्न करें विश्वविद्यालय -न्यायमूर्ति सुधीर नारायण
मुफ्त विश्वविद्यालय में आईपीआर पर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन
आदर्श सहारा टाइम्स
प्रयागराज। उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज में बुधवार को आयोजित बौद्धिक संपदा अधिकार पर एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला एवं जागरूकता कार्यक्रम के मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति सुधीर नारायण ने कहा कि बौद्धिक संपदा को वैश्विक स्तर पर सुरक्षित करने के लिए बड़े कानूनी बदलाव की आवश्यकता है क्योंकि भारत में बौद्धिक संपदा के संबंध में जो भी नियम लागू हैं वह वैश्विक स्तर पर मान्य नहीं हैं।
न्यायमूर्ति नारायण ने बौद्धिक संपदा अधिकार को विधिक परिपेक्ष्य में समझाते हुए बताया कि आईपीआर को लेकर भारत में अभी किसी अधिनियम का निर्माण नहीं किया गया। जिस प्रकार कॉपीराइट एक्ट की व्यवस्था है वैसी कोई व्यवस्था आईपीआर को लेकर नहीं है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को बौद्धिक संपदा अधिकार के संबंध में बड़े कदम उठाने चाहिए जिससे कि छात्रों के बीच जागरूकता उत्पन्न की जा सके।
मुख्य वक्ता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय की विधि विद्या शाखा की प्रोफेसर मानसी शर्मा ने कहा कि बौद्धिक संपदा के संबंध में व्यापक पैमाने पर जागरूकता की आवश्यकता है। मनुष्यों द्वारा प्रतिपादित कोई भी मौलिक रचना, सृजन उसकी बौद्धिक संपदा के अंतर्गत आती है। इस संपदा को विधिक संरक्षण के द्वारा ही सुरक्षित करना आईपीआर का मुख्य उद्देश्य है। प्रोफेसर शर्मा ने कहा कि वर्तमान पीढ़ी अपनी बौद्धिक संपदा को संरक्षित करें और उसे अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करे। हमें अपने परंपरागत एवं अर्जित ज्ञान रचना, निर्माण आदि को डिजिटल माध्यम में सुरक्षित करना चाहिए।
अध्यक्षता करते हुए उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सत्यकाम ने कहा कि बौद्धिक संपदा कभी अर्थपरक नहीं थी वरन् वह भारत में जनकल्याण के लिए हमेशा प्रयोग में लाई जाती रही। हमारे ऋषि मुनियों के पास बौद्धिक संपदा थी, ज्ञान था लेकिन उसका संबंध व्यवसाय से नहीं था। पश्चिमी सभ्यता में व्यवसाय महत्वपूर्ण हुआ। वह विद्या से जुड़ा, बौद्धिकता से जुड़ा और उसका विस्तार हो गया।
प्रोफेसर सत्यकाम ने कहा कि नवीन तकनीक और उनके उपभोग एवं प्रयोग के संबंध में आईपीआर को और सशक्त एवं व्यापक बनाया जाए। इसके साथ ही कृतिम बुद्धिमत्ता के दौर में बौद्धिक संपदा को सुरक्षित करने के लिए निहित कानून एवं नियमों का पालन करते हुए हमें उनको संदर्भित अवश्य करना चाहिए।
उद्घाटन सत्र में अतिथियों का वाचिक स्वागत प्रोफेसर सत्यपाल तिवारी तथा विषय प्रवर्तन प्रोफेसर जे पी यादव ने किया। कार्यशाला का संचालन डॉ गौरव संकल्प एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ सतीश चन्द्र जैसल ने किया। कार्यशाला के अन्तय तकनीकी सत्रों में प्रतिभागियों ने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
