प्रतीक आईटी कॉलेज में धूमधाम से मनाया गया सावित्रीबाई फुले का 195वां जन्मदिवस
नारी शिक्षा, सामाजिक समानता और संघर्ष की मिसाल को किया गया नमन
आदर्श सहारा टाइम्स
मांडा (प्रयागराज)। क्षेत्र के मोनाई स्थित प्रतीक आईटी कॉलेज कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र में भारत की प्रथम महिला शिक्षिका एवं नारी शिक्षा की अग्रदूत माता सावित्रीबाई फुले की 195वीं जयंती भव्यता एवं गरिमामय वातावरण में मनाई गई। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं, शिक्षकगण एवं सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. आर. डी. सोनकर तथा विशिष्ट अतिथि मनीषा बौद्ध (भावी जिला पंचायत सदस्य, उरुवा वार्ड–73) और विनोद कुमार वर्मा , राजीव सोनकर रहे। अतिथियों का स्वागत संस्था के संचालक अरुण गोयल द्वारा पुष्पांजलि एवं सम्मान के साथ किया गया।
सावित्रीबाई फुले का जीवन आज भी प्रेरणास्रोत – डॉ. आर. डी. सोनकर
मुख्य अतिथि डॉ. आर. डी. सोनकर ने अपने संबोधन में कहा कि माता सावित्रीबाई फुले का जीवन संघर्ष, साहस और सामाजिक परिवर्तन की अद्भुत मिसाल है। उन्होंने कहा कि जिस दौर में महिलाओं को पढ़ना पाप समझा जाता था, उस समय सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा को हथियार बनाकर समाज की जड़ताओं को तोड़ने का कार्य किया।
नारी सशक्तिकरण की असली आधारशिला हैं सावित्रीबाई फुले – मनीषा बौद्ध
विशिष्ट अतिथि मनीषा बौद्ध ने कहा कि आज महिलाओं को जो अधिकार और अवसर मिल रहे हैं, उसकी नींव सावित्रीबाई फुले जैसे महापुरुषों और महापुरुष महिलाओं ने रखी। उन्होंने छात्राओं से शिक्षा को अपना सबसे बड़ा बल बनाने का आह्वान किया।
शिक्षा से ही समाज बदलेगा – अरुण गोयल
संस्था के संचालक अरुण गोयल ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए माता सावित्रीबाई फुले के जीवन पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि सावित्रीबाई फुले का जन्म 03 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जनपद के नायगांव में हुआ था। उनके पिता खंडोजी एवं माता लक्ष्मीबाई थीं। बचपन से ही वे जिज्ञासु और महत्वाकांक्षी थीं।
उन्होंने बताया कि वर्ष 1840 में महात्मा ज्योतिराव फुले से विवाह के बाद सावित्रीबाई फुले ने अपने पति को गुरु मानकर शिक्षा प्राप्त की और समाज में फैली जातिवाद, छुआछूत और स्त्री-विरोधी मानसिकता के खिलाफ संघर्ष शुरू किया।
भारत की पहली बालिका पाठशाला की स्थापना
अरुण गोयल ने बताया कि 01 जनवरी 1848 को पुणे के भेलेवाड़ा में ज्योतिराव फुले के सहयोग से सावित्रीबाई फुले ने भारत की पहली बालिका पाठशाला की स्थापना की। शुरुआत में मात्र 9 छात्राओं से शुरू हुआ यह प्रयास धीरे-धीरे सामाजिक क्रांति में बदल गया।
उन्होंने बताया कि शिक्षा के प्रचार के दौरान सावित्रीबाई फुले को अत्यंत अपमानजनक परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। विद्यालय जाते समय उन पर गोबर और गंदगी फेंकी जाती थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे अपने साथ एक अतिरिक्त साड़ी लेकर चलती थीं और विद्यालय पहुँचकर कपड़े बदलकर पढ़ाने का कार्य करती थीं। यह साहस उस समय किसी क्रांति से कम नहीं था।
समाज आज भी ऋणी रहेगा
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि भारतीय समाज माता सावित्रीबाई फुले के योगदान का सदैव ऋणी रहेगा। उन्होंने अपना पूरा जीवन शिक्षा, समानता और मानवता के लिए समर्पित कर दिया। इसीलिए उन्हें भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, नारी शक्ति की प्रतीक और शिक्षा की देवी कहा जाता है।
कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थित लोगों ने माता सावित्रीबाई फुले के विचारों को अपने जीवन में अपनाने और समाज से भेदभाव, अंधविश्वास व असमानता को समाप्त करने का संकल्प लिया।
इस अवसर पर रिया दुबे ,काजल दुबे ,पलक प्रजापति ,साक्षी पाण्डेय ,सानिया पटेल ,प्रीति पाल ,सुषमा राहुल, राज उपाध्याय, रोहित, रत्नेश, चंद्र प्रकाश, धीरज, राज, विवेक उपाध्याय, आदर्श उपाध्याय, सिद्धांत, आर्य,गुप्ता ,कामना जैसल, बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
